Wednesday, May 14, 2008
वेलकम बैक बालाजी
मज़ा आ गया। इसे कहते हैं वापसी। लगभग ढाई साल बाद मैदान में उतरे लक्ष्मीपति बालाजी ने दिखा दिया की उनमें आज भी उतना ही दम है और उन्हें टीम में लेकर चेन्नई ने कोई गलती नहीं की है। आईपीएल की पहली हैटट्रिक लेकर उन्होनें अपने समर्थकों को खुश कर दिया ।
लगभग साढे तीन साल पहले बालाजी और पठान की जोड़ी ने धमाल मचा दिया था। एक दायें हाथ का बोलर और दूसरा बायें हाथ का, और बल्लेबाजों की नाक में दम कि बनायें तो रन कहाँ बनायें। पर ग्रेग चैपल ने इन दोनों प्रतिभावान बोलरों की प्रतिभा का नास पीट दिया। पठान को बोलर की बजाय बल्लेबाज़ बनाने की कोशिश ने उसका करियर ख़राब कर दिया और उनके उल्टे सीधे तरीकों ("प्रयोगों") ने बालाजी को तो टीम से ही बाहर करवा दिया। उस पर भी हाल वाही ढाक के तीन पात ।
वह तो अच्छा हुआ की चैपल यहाँ से चले गए वरना भारत की क्रिकेट टीम की हालत और भी ख़राब हो जाती।
पर अंत भला तो सब भला। चैपल ("जी"?) चले गए और भारत ने उनके जाने की खुशी ज़ोरदार तरीके से मनाई।
अब बालाजी ने वापस आकर और ऐसी ज़बरदस्त पर्फोर्मैंस देकर अपने समर्थकों में खुशी की लहर बिखेर दी है।
उन्हें मेरी भी बधाई।
लगभग साढे तीन साल पहले बालाजी और पठान की जोड़ी ने धमाल मचा दिया था। एक दायें हाथ का बोलर और दूसरा बायें हाथ का, और बल्लेबाजों की नाक में दम कि बनायें तो रन कहाँ बनायें। पर ग्रेग चैपल ने इन दोनों प्रतिभावान बोलरों की प्रतिभा का नास पीट दिया। पठान को बोलर की बजाय बल्लेबाज़ बनाने की कोशिश ने उसका करियर ख़राब कर दिया और उनके उल्टे सीधे तरीकों ("प्रयोगों") ने बालाजी को तो टीम से ही बाहर करवा दिया। उस पर भी हाल वाही ढाक के तीन पात ।
वह तो अच्छा हुआ की चैपल यहाँ से चले गए वरना भारत की क्रिकेट टीम की हालत और भी ख़राब हो जाती।
पर अंत भला तो सब भला। चैपल ("जी"?) चले गए और भारत ने उनके जाने की खुशी ज़ोरदार तरीके से मनाई।
अब बालाजी ने वापस आकर और ऐसी ज़बरदस्त पर्फोर्मैंस देकर अपने समर्थकों में खुशी की लहर बिखेर दी है।
उन्हें मेरी भी बधाई।
Friday, May 2, 2008
"आह !!! बड़ी गर्मी है और ऊपर से ये बिजली वाले भी क़यामत ढा रहे हैं। काश भगवान बारिश करवा दे और कुछ राहत मिले। "
हमारे देश में गर्मी का मौसम शुरू होते ही इस प्रकार के जुमले आम हो जाते हैं। कभी तो सर्दी इतनी भयंकर पड़ती है की लोगों जान ले लेती है और कभी गर्मी में चलने वाली लू लोगों के दम खींचने लगती है।
पर कुछ साल पहले तक ये हालात नहीं थे। न तो इतनी गर्मी पड़ती थी और न ही इतनी सर्दी, परन्तु पिछले पाँच - छः सालों से मौसम के हालात गंभीर हो गए हैं। पर अब तो भारत के एक हिस्से में तो भयंकर बाढ़ आती है और दूसरे हिस्से में सूखा लोगों और जानवरों की जान लेनी शुरू कर देता है। कुछ अनुभवी लोग इस बात पर ध्यान दें कि जब से हमारे देश में विदेशी गतिविधियाँ बढ़ी हैं ( विशेषकर पिछली दो सरकारों के कार्यकाल में), हमारे देश का पर्यावरण कुछ ज्यादा ही ख़राब हो गया है। जहाँ तक मेरी समझ में कारण आता है कि इन विदेशी कंपनियों ने अपने पुराने कारखाने, जो उनके देश में बंद करने पड़ रहे थे, को भारत भेजा ताकि उनको भारी नुकसान ना हो। हमारी सरकार भी खुश हो रही थी कि हमारे देश में विदेशी निवेश हो रहा है। उसने ये ध्यान देना कतई ज़रूरी नहीं समझा कि हमारे देश में पुरानी तकनीक की मशीनरी लाकर देश का पर्यावरण ख़राब करने की कोशिश हो रही है। इन कंपनियों ने अपने पुराने कारखानों को यहाँ ( भारत में) लगाकर यहाँ के स्रोतों का शोषण किया और इस प्रदूषण का सेहरा भारत के नाम बंधा।
काश !! हमारी सरकार में कुछ ऐसे लोग न बैठे होते जो अपने फायदे के लिए भारत को होने वाले नुकसान से अपनी आँखें ना मूँद लेते। रही सही कसर हमारी सरकारी नीतियों और हम लोगों ने पूरी कर दी है। हम लोगों ने जानते - बूझते अपने पर्यावरण ख़ुद ख़राब करने में कोई कसार नहीं छोडी। जहाँ चाह वहां के पेड़ काट डाले, नदियों को प्रदूषित कर दिया, समय बचाने के नाम पर वाहनों का जबरदस्त जखीरा खड़ा कर दिया और प्रदूषण पैदा करने वाले पाँचवे नम्बर के देश ( लिंक १ और लिंक दो ) के रूप में अपने देश को खड़ा कर दिया। परन्तु चिंता की कोई बात नहीं, हमारे देश के कुछ अमीर लोगों ने तो ठंडी विदेशी जगहों को घूमने का कार्यक्रम भी बना लिया होगा। आख़िर इस देश के गरीब लोगों को जिंदगी जीने के लिए कमाना भी ज़रूरी है। उनका तो रोज़ का कुआँ खोदना और रोज़ का पानी पीना।
अब भी समय है। हम लोगों को चेतना होगा, हमें ये वचन लेना होगा कि हम कम से कम प्रदूषण फैलाएंगे और अधिक से अधिक पेड़ पौधों को लगाकर प्रदूषण कम करने का प्रयत्न करेंगे।
हमारे देश में गर्मी का मौसम शुरू होते ही इस प्रकार के जुमले आम हो जाते हैं। कभी तो सर्दी इतनी भयंकर पड़ती है की लोगों जान ले लेती है और कभी गर्मी में चलने वाली लू लोगों के दम खींचने लगती है।
पर कुछ साल पहले तक ये हालात नहीं थे। न तो इतनी गर्मी पड़ती थी और न ही इतनी सर्दी, परन्तु पिछले पाँच - छः सालों से मौसम के हालात गंभीर हो गए हैं। पर अब तो भारत के एक हिस्से में तो भयंकर बाढ़ आती है और दूसरे हिस्से में सूखा लोगों और जानवरों की जान लेनी शुरू कर देता है। कुछ अनुभवी लोग इस बात पर ध्यान दें कि जब से हमारे देश में विदेशी गतिविधियाँ बढ़ी हैं ( विशेषकर पिछली दो सरकारों के कार्यकाल में), हमारे देश का पर्यावरण कुछ ज्यादा ही ख़राब हो गया है। जहाँ तक मेरी समझ में कारण आता है कि इन विदेशी कंपनियों ने अपने पुराने कारखाने, जो उनके देश में बंद करने पड़ रहे थे, को भारत भेजा ताकि उनको भारी नुकसान ना हो। हमारी सरकार भी खुश हो रही थी कि हमारे देश में विदेशी निवेश हो रहा है। उसने ये ध्यान देना कतई ज़रूरी नहीं समझा कि हमारे देश में पुरानी तकनीक की मशीनरी लाकर देश का पर्यावरण ख़राब करने की कोशिश हो रही है। इन कंपनियों ने अपने पुराने कारखानों को यहाँ ( भारत में) लगाकर यहाँ के स्रोतों का शोषण किया और इस प्रदूषण का सेहरा भारत के नाम बंधा।
काश !! हमारी सरकार में कुछ ऐसे लोग न बैठे होते जो अपने फायदे के लिए भारत को होने वाले नुकसान से अपनी आँखें ना मूँद लेते। रही सही कसर हमारी सरकारी नीतियों और हम लोगों ने पूरी कर दी है। हम लोगों ने जानते - बूझते अपने पर्यावरण ख़ुद ख़राब करने में कोई कसार नहीं छोडी। जहाँ चाह वहां के पेड़ काट डाले, नदियों को प्रदूषित कर दिया, समय बचाने के नाम पर वाहनों का जबरदस्त जखीरा खड़ा कर दिया और प्रदूषण पैदा करने वाले पाँचवे नम्बर के देश ( लिंक १ और लिंक दो ) के रूप में अपने देश को खड़ा कर दिया। परन्तु चिंता की कोई बात नहीं, हमारे देश के कुछ अमीर लोगों ने तो ठंडी विदेशी जगहों को घूमने का कार्यक्रम भी बना लिया होगा। आख़िर इस देश के गरीब लोगों को जिंदगी जीने के लिए कमाना भी ज़रूरी है। उनका तो रोज़ का कुआँ खोदना और रोज़ का पानी पीना।
अब भी समय है। हम लोगों को चेतना होगा, हमें ये वचन लेना होगा कि हम कम से कम प्रदूषण फैलाएंगे और अधिक से अधिक पेड़ पौधों को लगाकर प्रदूषण कम करने का प्रयत्न करेंगे।
Thursday, May 1, 2008
भाई साहब, आज कल खाद्यान्न पर कुछ ज्यादा ही मारा - मारी हो रही है। पता चला है कि दुनिया भर में खाद्यान्न संकट बढ़ता ही जा रहा है। कुछ विश्लेषक तो यहाँ तक कह रहे हैं कि विश्व के पास केवल ४ दिनों का अनाज बाकी है। इस संकट का एक कारण अनाज की बढ़ती मंहगाई भी है।
असल में, भारत में इसकी शुरुआत काफी समय पहले ही हो गई थी, जब भारत सरकार ने वायदा व्यापार में अनाज को शामिल करने की छूट दे दी थी। परन्तु अब समय आ गया है की भारत सरकार अपने इस कदम को वापस खींच ले और वायदा व्यापार में से सभी तरह के अनाजों, दलहनों, तिलहनों, तथा मोटे अनाजों के व्यापार को समाप्त करे वरना देश में भुखमरी की हालत पैदा हो सकती है।
इसके साथ ही सरकार का ये भी दायित्व बनता है कि वो इस बात को सुनिश्चित करे कि गरीब परिवारों को मिलने वाले राशन को ब्लैक में न बेचा जा सके।
मुझे लगता है की कुछ लोग हमारे भारत को दोबारा बांटना चाहते हैं। इनमें से कुछ अपने को दक्षिण भारत का महान नेता कहलवाने के लिए ही ये सब कुछ कर रहे हैं। मज़े की बात है की इनकी देखा-देखि और लोग भी इस सब में शामिल हो रहे हैं।
शायद ये सब लोग नहीं जानते की इस तरह का घटिया प्रचार कुछ दिनों तक ही सीमित रहता है। बाद में उन्ही को इससे नुकसान होना शुरू हो जाएगा। तब उन्हें समझ में आएगा कि ये सब कितना घटिया है।
परन्तु अभी तो हम केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं कि भगवन इन लोगों को सद्बुद्धि दे और उनको ये बात समझ में आ जाए कि " भारत अखंड है और अखंड ही रहेगा। "
शायद ये सब लोग नहीं जानते की इस तरह का घटिया प्रचार कुछ दिनों तक ही सीमित रहता है। बाद में उन्ही को इससे नुकसान होना शुरू हो जाएगा। तब उन्हें समझ में आएगा कि ये सब कितना घटिया है।
परन्तु अभी तो हम केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं कि भगवन इन लोगों को सद्बुद्धि दे और उनको ये बात समझ में आ जाए कि " भारत अखंड है और अखंड ही रहेगा। "
Wednesday, April 30, 2008
आजकल श्रीसंत और हरभजन के विवाद को लेकर काफी चर्चा हो रही है। हरभजन पर इस विवाद को लेकर काफी कुछ झेलना पड़ा जिसमे हरभजन को आईपीएल के अपने बाकी मैचों से बाहर होना पड़ा और लगभग पौने तीन करोड़ रुपयों से भी हाथ धोना पड़ा।
मुझे लगता है की भज्जी ( हरभजन) को कुछ ज्यादा ही कड़ी सज़ा दे दी गई है। मैं मानता हूँ कि उन्हें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए था। श्रीसंत भी कुछ कम नहीं है। हम सब उनकी आक्रामकता के बारे में काफी कुछ जानते हैं और ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध श्रंखला में उनकी इस आक्रामकता का हम भारतीयों ने काफी स्वागत किया था। पर उन्हें किसी भी खिलाड़ी को इतना परेशान नहीं करना चाहिए था कि वो कुछ असामान्य हरकत कर बैठे।
आशा है कि वो आइन्दा इस बात का ध्यान रखेंगे और अपनी आक्रामकता में कुछ कमी लाने का प्रयास करेंगे।
मुझे लगता है की भज्जी ( हरभजन) को कुछ ज्यादा ही कड़ी सज़ा दे दी गई है। मैं मानता हूँ कि उन्हें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए था। श्रीसंत भी कुछ कम नहीं है। हम सब उनकी आक्रामकता के बारे में काफी कुछ जानते हैं और ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध श्रंखला में उनकी इस आक्रामकता का हम भारतीयों ने काफी स्वागत किया था। पर उन्हें किसी भी खिलाड़ी को इतना परेशान नहीं करना चाहिए था कि वो कुछ असामान्य हरकत कर बैठे।
आशा है कि वो आइन्दा इस बात का ध्यान रखेंगे और अपनी आक्रामकता में कुछ कमी लाने का प्रयास करेंगे।
Welcome
नमस्ते,
आज मैंने अपने ब्लॉग की शुरुआत की है।
आशा है कि आप लोग मेरे उत्साह को अपने अमूल्य बातों से बढायेंगे।
धन्यवाद।
आज मैंने अपने ब्लॉग की शुरुआत की है।
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